>आयल फेरो समय लगनक

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दलान पर किछु लोक छथि बैसल,
ककरो मोन खनहन, ककरो मुंह लटकल,
सभ करैत छथि गप्प-सरक्का,
कखनो काल कऽ हँसी-ठट्ठा,
ताहि बीच कखनो चलैछ चटक-मटक,
आयल फेरो समय लगनक।

क्यो दऽ रहल छथि मोंछ पर ताव,
तऽ किनको हृदय मे छनि पैघ घाव,
बेटाक बाप करैछ अपन बेटाक बड़ाइ,
ओ लेबे करता खूब ऐंठि कऽ पाइ,
नहि चलैछ बेटी बापक सकपक,
आयल फेरो समय लगनक।

दरवज्जे पर सँ होइछ कथा,
केऽ आब जायत सौराठ सभा,
ओतय कखनो लागि जेतै घटा,
तऽ फेर कखनो हेतै खूब नफा,
पेटो तऽ चलै छै, ओतय बियाह होइ छलै चटपट,
आयल फेरो समय लगनक।

खूब फरैछ एखन झूठक खेती,
भाँड़ मे जाओ दोसरक बेटी,
बुद्धि खटाउ भेटत कमीशन,
एक्के बेर तऽ चाही परमीशन,
मनुक्ख बिकाइछ हाथे दलालक,
आयल फेरो समय लगनक।

ककरो कुहरेने क्यो भऽ जाइछ ने सुखी,
ठीके कहै छी हम, तकै छी की ?
होइछ थोड़हि ने किछु दहेजक टका सँ,
खेत नहि पनियाइछ बैसाखक घटा सँ,
मेटाऊ समाज सँ नाओ एहि कुकृत्यक,
आयल फेरो समय लगनक

दहेज लेब थिक घोर पाप,
समाज केर ई कारी छाप,
मेटाऊ आदर्शक मेटौना सँ,
देखू आयल घट्टक बेतौना सँ,
बेर अछि एखने दहेज दमनक,
आयल फेरो समय लगनक।

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More Poems (Published) By रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ’
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